प्रतीक्षा
सजल नयनों की बुझती सी ज्योति,
टीस फ़िर एक छले गए ह्रदय की,
अर्थ, जो शीशे से टूट के बिखरे,
कविता वही फ़िर , प्रेमी विरह की।
उदगार हैं मेरेही ह्रदय के ,
अपने अधरों से यदि गाओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
छल था या कोई स्वप्न सा था,
है छाप जिसकी इस मन में मेरे,
वो हम तुम ही थे जो नयनों से अपने,
हर पहर खोलते थे , सांझ और सवेरे,
एक पहर है जो ढलकर खुला नही,
सोचकर की तुम फ़िर आओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
जब मैंने पा ही लिया है तुम्हे,
आभास होता है की खो दिया हो,
नए रास्तों पर, नई मंजिलों को,
पा लूँ , तुमने ये तय कर लिया हो,
रैन बसेरे सी पलकें मेरी, तुम
रात्रि के अन्तिम पहर , लौट जाओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
प्रेम न बाँध पाया है शायद,
आत्मा तूम्हारी मेरे ह्रदय से,
अधिकार हो, तो भी कैसे मांगू,
मेरा एक ही क्षण, तुम्हारे समय से,
नैनों में प्रतीक्षा , छलक आएगी तो,
अपने ही मन को क्या समझोगे?
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे ,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे.
Wednesday, September 23, 2009
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8 comments:
Jaise bhakt aur bhagwaan ke beech koi dwand hota hai, do premi ek dusre se ladte hain. Par jaante hain ki ek, dusre ke bina bas kshanik maatra hain.
Bahut khoob!
Bahut dino ke baad kuch acha padha hai.
dhanyavaad..
wonderful poem honey!!! remarkable stuff
I did not realise that you had such talent. Keep it up Chetna
great to see ur comments rishi..
thank u parul to give it ur time..really inspiring..
hey nice composition :).
thank u narendra...
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