अथाह
दुःख में, दुखों के गर्भ में,
सुख के अनछुए सन्दर्भ में,
आयु है क्या , क्या आंकलन,
न समय, न समय का ही स्मरण.
थाह पा लूं , यदि इस अथाह की,
तो इस चंचल चिरायु चाह की,
गति को अपनी गति मिले,
चाहे भाव मिले या क्षति मिले.
इस कोमल कल्पना को तोलकर,
भाव शब्दों में बोलकर,
चिरनिद्रा मृत्यु कि पा लूं मैं
दुखों को छंद दे , गा लूं मैं,
यही आस है , यही कामना,
शीघ्र हो अथाह से सामना.
Monday, July 5, 2010
Thursday, November 12, 2009
स्मृति
उस नैनरस के स्मरण भर से ,
मेरे भाव बादल बन गए,
अश्रु झिलमिला उठे और,
स्वप्न काजल बन गए।
पाथेय पर आशाएं बिखरी,
लगा सूर्य क्षितिज से झाँकने,
देख पथ के जुगनू,नभ के तारे,
कुछ सोचकर, कुछ आंकने।
अपने आलिंगन में कर लिया,
जब वायु ने सुगंध को,
आश्रय मिला तेरे ह्रदय का,
मेरे मन स्वछन्द को।
अब भी है अंकित ,इस दृष्टि में,
वो कोमल छवि,वो नैनरस,
समय के पाथेय से,
चुरा रखा है मैंने हर दिवस...
Wednesday, September 23, 2009
प्रतीक्षा
सजल नयनों की बुझती सी ज्योति,
टीस फ़िर एक छले गए ह्रदय की,
अर्थ, जो शीशे से टूट के बिखरे,
कविता वही फ़िर , प्रेमी विरह की।
उदगार हैं मेरेही ह्रदय के ,
अपने अधरों से यदि गाओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
छल था या कोई स्वप्न सा था,
है छाप जिसकी इस मन में मेरे,
वो हम तुम ही थे जो नयनों से अपने,
हर पहर खोलते थे , सांझ और सवेरे,
एक पहर है जो ढलकर खुला नही,
सोचकर की तुम फ़िर आओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
जब मैंने पा ही लिया है तुम्हे,
आभास होता है की खो दिया हो,
नए रास्तों पर, नई मंजिलों को,
पा लूँ , तुमने ये तय कर लिया हो,
रैन बसेरे सी पलकें मेरी, तुम
रात्रि के अन्तिम पहर , लौट जाओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
प्रेम न बाँध पाया है शायद,
आत्मा तूम्हारी मेरे ह्रदय से,
अधिकार हो, तो भी कैसे मांगू,
मेरा एक ही क्षण, तुम्हारे समय से,
नैनों में प्रतीक्षा , छलक आएगी तो,
अपने ही मन को क्या समझोगे?
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे ,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे.
सजल नयनों की बुझती सी ज्योति,
टीस फ़िर एक छले गए ह्रदय की,
अर्थ, जो शीशे से टूट के बिखरे,
कविता वही फ़िर , प्रेमी विरह की।
उदगार हैं मेरेही ह्रदय के ,
अपने अधरों से यदि गाओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
छल था या कोई स्वप्न सा था,
है छाप जिसकी इस मन में मेरे,
वो हम तुम ही थे जो नयनों से अपने,
हर पहर खोलते थे , सांझ और सवेरे,
एक पहर है जो ढलकर खुला नही,
सोचकर की तुम फ़िर आओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
जब मैंने पा ही लिया है तुम्हे,
आभास होता है की खो दिया हो,
नए रास्तों पर, नई मंजिलों को,
पा लूँ , तुमने ये तय कर लिया हो,
रैन बसेरे सी पलकें मेरी, तुम
रात्रि के अन्तिम पहर , लौट जाओगे,
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे।
प्रेम न बाँध पाया है शायद,
आत्मा तूम्हारी मेरे ह्रदय से,
अधिकार हो, तो भी कैसे मांगू,
मेरा एक ही क्षण, तुम्हारे समय से,
नैनों में प्रतीक्षा , छलक आएगी तो,
अपने ही मन को क्या समझोगे?
शब्दों, अर्थों में न खोजना मुझे ,
स्वयं को खोकर ही मुझे पाओगे.
Friday, December 19, 2008
रूपगर्विता
मोहित हो उस अद्भुत सौंदर्य से,
नयनों पर लगा कामना का काजल,
अधरों पर विश्राम करते सैकड़ों शब्द,
ह्रदय में बहते भाव अविरल, निर्मल।
हाथों की गागर में आशा का साग़र,
कर्ण द्वार पर प्रेम गीतों की गुंजन,
दृष्टि में संजोया उसी प्रिय का मुख तेज,
जो दे मन के तारों में सरगम का कम्पन।
केशों के घन , निर्झर पानी से प्रेरित,
पवन की दिशा में बहे जा रहे से,
कानों के कुंडल किनारे के साथी,
हवाओं के झोंके सहे जा रहे से।
आँचल में खुशबू, रात की रानी सी,
उलझते हैं जिस से , महक़ पा के कंगन,
पायल की खनक कहती अनकही सी,
पाने को पावों के आश्रय का चुम्बन।
समेटे हुए तन में सागर स्वरों का,
कंठ में जैसे कोयल का स्वर हो,
आहट भी चंचल , मृगनी सी स्वर्णिम,
तीव्रता नदी की धारा मगर हो.
मुख भाव ऐसे की , चन्द्रमा मुग्ध हो,
सूरज से प्रेरित चमक वार दे,
देह पर लचक जैसे बेलें लिपट के,
चंदन के तन पर सब हार दे.
छूकर कर को करे मुग्ध , शोभित,
वो हिना भी जैसे शर्मा रही हो,
रेशम से हाथों की पंक्तियों पर,
लकीरें बना रंग बिखरा रही हो.
वो चीरती सी , पवन की दिशा को,
विहगों की गति से गति मिला रही है,
लिपटी हुई प्रेमसागर के जल मैं,
ये कौन रूपगर्विता चली आ रही है..
Saturday, March 8, 2008
अमर हो जाऊं मैं ...
मुझे सूर्य दो नैनों से तो
किरणों के हार बनाऊं मैं,
मुझे दो गति ह्रदय से तो,
संग कल्पना उड़ जाऊं मैं ।
मुझे प्राण दो छूकर कभी,
कि मेरी श्वास तुम्हारी सुगंध हो,
दो बाहों के बन्धन मुझे,
कि पीङायें सभी स्वछन्द हों ।
दो सुबह, नैनों को खोलकर ,
कि दर्प अपना पा सकूं,
कंठ स्वर भी कि मैं,
भावों को लय दे गा सकूं।
अश्रु दो अपने नयन के,
कि डूब ,कभी ऊपर उठ
बल दो शब्दों से तो,
तत्पर रहूँ, न पथ से हटूं।
मुझे स्नेह दो, कि सर्वत्र ,
उस प्रेम को ही पाऊन मैं,
मुझे आत्मा दो, प्रक्रिति से,
कि फिर अमर हो जाऊ मैं ।
किरणों के हार बनाऊं मैं,
मुझे दो गति ह्रदय से तो,
संग कल्पना उड़ जाऊं मैं ।
मुझे प्राण दो छूकर कभी,
कि मेरी श्वास तुम्हारी सुगंध हो,
दो बाहों के बन्धन मुझे,
कि पीङायें सभी स्वछन्द हों ।
दो सुबह, नैनों को खोलकर ,
कि दर्प अपना पा सकूं,
कंठ स्वर भी कि मैं,
भावों को लय दे गा सकूं।
अश्रु दो अपने नयन के,
कि डूब ,कभी ऊपर उठ
बल दो शब्दों से तो,
तत्पर रहूँ, न पथ से हटूं।
मुझे स्नेह दो, कि सर्वत्र ,
उस प्रेम को ही पाऊन मैं,
मुझे आत्मा दो, प्रक्रिति से,
कि फिर अमर हो जाऊ मैं ।
Tuesday, February 26, 2008
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