Friday, December 19, 2008

रूपगर्विता

मोहित हो उस अद्भुत सौंदर्य से,
नयनों पर लगा कामना का काजल,
अधरों पर विश्राम करते सैकड़ों शब्द,
ह्रदय में बहते भाव अविरल, निर्मल।


हाथों की गागर में आशा का साग़र,
कर्ण द्वार पर प्रेम गीतों की गुंजन,
दृष्टि में संजोया उसी प्रिय का मुख तेज,
जो दे मन के तारों में सरगम का कम्पन।


केशों के घन , निर्झर पानी से प्रेरित,
पवन की दिशा में बहे जा रहे से,
कानों के कुंडल किनारे के साथी,
हवाओं के झोंके सहे जा रहे से।



आँचल में खुशबू, रात की रानी सी,
उलझते हैं जिस से , महक़ पा के कंगन,
पायल की खनक कहती अनकही सी,
पाने को पावों के आश्रय का चुम्बन।


समेटे हुए तन में सागर स्वरों का,
कंठ में जैसे कोयल का स्वर हो,
हट भी चंचल , मृगनी सी स्वर्णिम,
तीव्रता नदी की धारा मगर हो.


मुख भाव ऐसे की , चन्द्रमा मुग्ध हो,
सूरज से प्रेरित चमक वार दे,
देह पर लचक जैसे बेलें लिपट के,
चंदन के तन पर सब हार दे.

छूकर कर को करे मुग्ध , शोभित,
वो हिना भी जैसे शर्मा रही हो,
रेशम से हाथों की पंक्तियों पर,
लकीरें बना रंग बिखरा रही हो.


वो चीरती सी , पवन की दिशा को,
विहगों की गति से गति मिला रही है,
लिपटी हुई प्रेमसागर के जल मैं,
ये कौन रूपगर्विता चली आ रही है..