Saturday, March 8, 2008

अमर हो जाऊं मैं ...

मुझे सूर्य दो नैनों से तो
किरणों के हार बनाऊं मैं,
मुझे दो गति ह्रदय से तो,
संग कल्पना उड़ जाऊं मैं ।

मुझे प्राण दो छूकर कभी,
कि मेरी श्वास तुम्हारी सुगंध हो,
दो बाहों के बन्धन मुझे,
कि पीङायें सभी स्वछन्द हों ।

दो सुबह, नैनों को खोलकर ,
कि दर्प अपना पा सकूं,
कंठ स्वर भी कि मैं,
भावों को लय दे गा सकूं।

अश्रु दो अपने नयन के,
कि डूब ,कभी ऊपर उठ

बल दो शब्दों से तो,

तत्पर रहूँ, पथ से हटूं।

मुझे स्नेह दो, कि सर्वत्र ,
उस प्रेम को ही पाऊन मैं,
मुझे आत्मा दो, प्रक्रिति से,
कि फिर अमर हो जाऊ मैं ।